श्रीमति लतिका रेणू (फणीश्वरनाथ रेणुकी श्रीमति)

श्रीमति लतिका रेणू (फणीश्वरनाथ रेणुकी श्रीमति)

कतिपय पुराना मान्छे भन्छन्, बीपी ‘बीपी’ बन्नमा ‘देवेन्द्र’, ‘फणीश्वर नाथ रेणु’ ‘भोला चटर्जी’को हात छ, त्यसो त यसै भनाईलाई ठीक उल्टो गरि पनि भन्न सकिएला र बीपीको योगदानका वारेमा चर्चा गर्न सकिएला। जे होस्, यहाँ चर्चा गर्न लागिएका पात्र हुन् “फणीश्वर नाथ रेणु” को हो। रेणु र बीपी दुई साथी, दाजुभाइ, क्रान्तिकारी, योद्धा र लेखक सबै थिए। पटनामा जन्मिएर नेपाली क्रान्तिका लागि अतुलनीय योगदान पुर्याएका रेणुलाई नेपालीहरूले त उहिल्यै विर्सीसके। कांग्रेसका तत्कालिन नेताहरूले पनि बिर्से नै होलान्। तर, कोइराला परिवारलाई परेको दु:ख-सुखमा हरदम साथ दिने रेणु र वहाँको परिवारका वारेमा के कोइराला परिवारको कुनै व्यक्तिले सोचेको, सम्झेको होला। फणीश्वर नाथ रेणु वितेको धेरै वर्ष भइसक्यो तर उनका पत्नि श्रीमती रेणुलाई कोइराला परिवारका कुनै सदस्यले कहिल्यै सम्झे, सम्झेनन् वा भेटे भेटेनन् थाहा छैन। आर्थिक वा अन्य सहयोगको लागि होइन तर के फणीश्वरनाथ रेणुजस्ता अग्रज लेखक र नेपाली क्रान्तिका वरिष्ट व्यक्तित्वकी पत्नि  लतिका रेणुलाई सम्झन जरूरी छैन? थोरै माया र सद्‌भाव देखाउन जरूरी छैन। यो कस्तो खालको वैगुनी परम्परा हो? के नेपालीहरू प्रति भारतीयहरूले देखाउने माया, सद्‌भाव र श्रद्धालाई यस्तै-यस्तै वैगुनका कारणले गर्दा असर परेको त छैन।

यहाँ हिन्दीमा लेखिएको लेख छ- लतिका रेणुका वारेमा। नेपालीमा अनुवाद गर्न नसकेकोमा क्षमा माग्दै हिन्दीभाषाको उक्त लेखलाई जस्ताको तस्तै राखिएको छ।

Saturday, May 19, 2007
एक मुलाकात लतिका रेणु से

एक ठुमरीधर्मा जीवन का अंतरमार्ग
– रेयाज-उल-हक

राजेंद्रनगर के ब्लॉक नंबर दो में पटना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट का एक पुराना मकान. दूसरी मंजिल पर हरे रंग का एक दरवाजा. जंग लगा एक पुराना नेम प्लेट लगा है- फणीश्वरनाथ रेणु . एक झुर्रीदार चेहरेवाली औसत कद की एक बूढ़ी महिला दरवाजा खोलती हैं-लतिका रेणु. रेणु जी की पत्नी. मेरे साथ गये बांग्ला कवि विश्वजीत सेन को देख कर कुछ याद करने की कोशिश करती हैं. वे हमें अंदर ले जाती हैं.

फनीश्वरनाथ रेणुको घरमा लागेको पुरानो नेमप्लेट

फनीश्वरनाथ रेणुको घरमा लागेको पुरानो नेमप्लेट

कमरे में विधानचंद्र राय, नेहरू और रेणु जी की तसवीर. 1994 का एक पुराना कैलेंडर. किताबों और नटराज की प्रतिमा पर धूल जमी है. बाहर फोटो टंगे हैं-रेणु और उनके मित्रों के. घर में लगता है, रेणु का समय अब भी बचा हुआ है. एक ओर कटी सब्जी का कटोरा रखा हुआ है-शायद वे सब्जी काट रही थीं. बातें शुरू होती हैं. वे रेणु जी पर प्राय: बात नहीं करना चाहतीं. अगर मेरे साथ विश्वजीत दा नहीं होते तो उनसे बात कर पाना मुश्किल था. पुराना परिचय है उनका. काफी कुछ दिया है इस महिला ने रेणु को. प्रकारांतर से हिंदी साहित्य को. हजारीबाग के सेंट कोलंबस कॉलेज के एक प्रोफेसर की बेटी लतिका जी इंटर करने के बाद पटना आयी थीं-नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए. फिर पटना की ही होकर रह गयीं. पटना मेडिकल कॉलेज में ही भेंट हुई फणीश्वरनाथ रेणु से. उनके फेफड़ों में तकलीफ थी. नेपाल में राणाशाही के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे रेणु. एक बार वे गिर गये और पुलिस ने उनकी पीठ को अपने बूटों से रौंद डाला था. तब से खराब हो गये फेफ ड़े. खून की उल्टी तभी से शुरू हुई.

लतिका जी उन दिनों को याद करते हुए कभी उदास होती हैं, कभी हंसती हैं, वैसी हंसी जैसी जुलूस की पवित्रा हंसती है. ट्रेनिंग खत्म होने के बाद पटना में ही गर्दनीबाग में चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में नियुक्ति हुई. छह माह बाद सब्जीबाग के सिफ्टन चाइल्ड वेल्फेयर सेंटर में आ गयीं. तब तक रेणु जी से उनकी शादी हो चुकी थी. रेणु जी ने उन्हें बताया नहीं कि उनकी एक पत्नी औराही हिंगना में भी हैं. शादी के काफी समय बाद जब वे पूर्णिया उनके घर गयीं तो पता चला. इस पर वे नाराज भी हुईं, पर मान गयीं.

लतिका जी शादी से जुड़े इन प्रसंगों को याद नहीं करना चाहतीं. काफी कटु अनुभव हैं उनके. रेणु जी के पुत्र ने उनकी किताबों का उत्तराधिकार उनसे छीन लिया. वह यह फ्लैट भी ले लेना चाहता था, जिसमें अभी वे हैं और जिसे उन्होंने अपने पैसे से खरीदा था. रेणु जी ने इस फ्लैट के आधार पर 20000 रुपये कर्ज लिये थे बैंक से. बैंक ने कहा कि जो पैसे चुका देगा फ्लैट उसका. लतिका जी ने कैसे-कैसे वे पैसे चुकाये और फ्लैट हासिल किया.
वे भुला दी गयी हैं. अब उन किताबों पर उनका कोई अधिकार नहीं रहा, जिनकी रचना से लेकर प्रकाशन तक में उनका इतना योगदान रहा. मैला आंचल के पहले प्रकाशक ने प्रकाशन से हाथ खींच लिया, कहा कि पहले पूरा पैसा जमा करो. लतिका जी ने दो हजार दिये तब किताब छपी. नेपाल के बीपी कोइराला को किताब की पहली प्रति भेंट की गयी. उसका विमोचन सिफ्टन सेंटर में ही सुशीला कोइराला ने किया.

इसके बाद, जब उसे राजकमल प्रकाशन ने छापा तो उस पर देश भर में चर्चा होने लगी. लतिका जी बताती हैं कि रेणु दिन में कभी नहीं  लिखते, घूमते रहते और गपशप करते. हमेशा रात में लिखते, मुसहरी लगा कर. इसी में उनका हेल्थ खराब हुआ. लिख लेते तो कहते-सारा काम छोड़ कर सुनो. बीच में टोकाटाकी मंजूर नहीं थी उन्हें. कितना भी काम हो वे नहीं मानते. अगर कह दिया कि अभी काम है तो गुस्सा जाते, कहते हम नहीं बोलेंगे जाओ. फिर उस दिन खाना भी नहीं खाते. जब तीसरी कसम फिल्म बन रही थी तो रेणु मुंबई गये. उनकी बीमारी का टेलीग्राम पाकर वे अकेली मुंबई गयीं. मगर रेणु ठीक थे. वहां उन्होंने फिल्म का प्रेस शो देखा. तीसरी कसम पूरी हुई. लतिका जी ने पटना के वीणा सिनेमा में रेणु जी के साथ फ़िल्म देखी. उसके बाद कभी नहीं देखी तीसरी कसम.
रेणु के निधन के बाद उनके परिवारवालों से नाता लगभग टूट ही गया. उनकी एक बेटी कभी आ जाती है मिलने. गांववाली पत्नी भी पटना आती हैं तो आ जाती हैं मिलने, पर लगाव कभी नहीं हुआ. नर्सिंग का काम छोड़ने के बाद कई स्कूलों में पढ़ाती रही हैं. अब घर पर खाली हैं. आय का कोई जरिया नहीं है. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद 700 रुपये प्रतिमाह देता है, पर वह भी साल भर-छह महीने में कभी एक बार. पूछने पर कि इतने कम में कैसे काम चलता है, वे हंसने लगती हैं-चल ही जाता है.

अब वे कहीं आती-जाती नहीं हैं. किताबें पढ़ती रहती हैं, रेणु की भी. सबसे अधिक मैला आंचल पसंद है और उसका पात्र डॉ प्रशांत. अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में अनुदित रेणु की किताबें हैं लतिका जी के पास. खाली समय में बैठ कर उनको सहेजती हैं, जिल्दें लगाती हैं. लतिका जी ने अपने जीवन के बेहतरीन साल रेणु को दिये. अब 80 पार की अपनी उम्र में वे न सिर्फ़ अकेली हैं, बल्कि लगभग शक्तिहीन भी. उनकी सुधि लेनेवाला कोई नहीं है. रेणु के पुराने मित्र भी अब नहीं आते.

एक ऐसी औरत के लिए जिसने हिंदी साहित्य की अमर कृतियों के लेखन और प्रकाशन में इतनी बड़ी भूमिका निभायी, सरकार के पास नियमित रूप से देने के लिए 700 रुपये तक नहीं हैं. हाल ही में पटना फिल्म महोत्सव में तीसरी कसम दिखायी गयी. किसी ने लतिका जी को पूछा तक नहीं. शायद सब भूल चुके हैं उन्हें, वे सब जिन्होंने रेणु और उनके लेखन से अपना भविष्य बना लिया. एक लेखक और उसकी विरासत के लिए हमारे समाज में इतनी संवेदना भी नहीं बची है.
प्रस्तुति : Reyaz-ul-haque समय 11:09 AM
http://hashiya.blogspot.com/2007/05/blog-post_19.html

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